सामुदायिक स्वास्थ्य ज्ञान, आशा-मितानिन कार्यकर्ताओं की मैदानी आवाजें, व्यावहारिक पुस्तिकाएं और ऑडियो-वीडियो सामग्री का खुला संकलन।
स्वास्थ्य केवल अस्पताल और रोग का इलाज नहीं, बल्कि समता, स्वायत्तता और मानवाधिकार का जन-आंदोलन है।
स्वास्थ्य के सामाजिक कारक, समता, मानवाधिकार एवं जन-सहभागिता
सोचारा (SOCHARA) द्वारा विकसित वे बुनियादी प्रतिमान, जिन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य साथी समूह ने अपनी समूची कार्यप्रणाली, प्रशिक्षण और नीतिगत दृष्टि में अक्षरशः अपनाया है।
जन स्वास्थ्य व्यवस्थाएं, परियोजनाएं और कार्यक्रम अधिकतर संकीर्ण जैव-चिकित्सा (बायोमेडिकल) ढांचे में बनाए गए हैं, जिनका केंद्र स्वास्थ्य और कल्याण की बजाय बीमारी रहा है। यह तब भी है जब 1948 की विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) परिभाषा ने शारीरिक, मानसिक और सामाजिक—सभी आयामों के कल्याण पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया था। अल्मा-अता घोषणा ने सामाजिक न्याय, समता, सामाजिक विकास और अधिकारों की ओर रुख करके एक नया दृष्टिकोण शुरू किया। नागरिक समाज और जन आंदोलनों ने इसे आगे बढ़ाने का प्रयास किया है, पर सफलता सीमित रही क्योंकि जैव-चिकित्सा प्रतिमान इतना गहरा जड़ जमा चुका है। ग्लोबल फोरम फॉर हेल्थ रिसर्च में इस प्रतिमान को विस्तार से रखा गया, ताकि स्वास्थ्य व्यवस्था के हर पक्ष—संरचना, फोकस, आयाम, प्रौद्योगिकी, सेवा का प्रकार, लोगों से संबंध और शोध—में जैव-चिकित्सा केंद्रितता से बदलाव हो।
| दृष्टिकोण (Approach) | जैव-चिकित्सा (Biomedical) | सामाजिक-सामुदायिक (Social community) |
|---|---|---|
| फोकस (Focus) | व्यक्ति (Individual) | समुदाय (Community) |
| आयाम (Dimensions) | शारीरिक / रोगात्मक (Physical / Pathological) | मनोसामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक, पारिस्थितिक |
| प्रौद्योगिकी (Technology) | दवाएं / टीके (Drugs / Vaccines) | शिक्षा और सामाजिक प्रक्रियाएं |
| सेवा का प्रकार (Type of service) | प्रदान करना / निर्भरता पैदा करना / सामाजिक विपणन | सक्षम बनाना / सशक्त करना / स्वायत्तता बढ़ाना |
| लोगों से संबंध (Link with people) | मरीज निष्क्रिय लाभार्थी के रूप में | समुदाय सक्रिय सहभागी के रूप में |
| शोध (Research) | आणविक जीवविज्ञान, औषध-चिकित्सा, नैदानिक महामारी विज्ञान | सामाजिक-महामारी विज्ञान, सामाजिक निर्धारक, स्वास्थ्य व्यवस्थाएं और सामाजिक नीति |
यदि सभी नीतियों में स्वास्थ्य के जरिए स्वास्थ्य में सामाजिक न्याय वास्तविकता बनना है, तो नीति-निर्माताओं को इस प्रतिमान परिवर्तन को समझना होगा। उन्हें इन सात बदलावों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए:
स्रोत: SOCHARA — Paradigm Shift (डॉ. रवि नारायण; WHO SEARO महामारी विज्ञान चर्चा सहित)
स्वयंसिद्ध सूत्र वे कथन या विचार हैं जिन्हें लोग सत्य मानते हैं। ये सूत्र जनवरी 1984 में शुरू हुए अध्ययन-चिंतन-कार्रवाई प्रयोग के पहले दो वर्षों में, भारत के सामुदायिक स्वास्थ्य आंदोलन के साथ कम्युनिटी हेल्थ सेल की प्रारंभिक भागीदारी से निकले। 1987 में प्रसारित रिपोर्ट “Community Health: the search for an alternative process” में आंदोलन से निकले ये 10 सूत्र गिनाए गए। 2011 में सोचारा के 20 वर्ष (1991–2011) पर यह चिंतन रिपोर्ट, जिसे तब रेड रिपोर्ट कहा जाता था, “Community Health in search of Alternative Processes” के रूप में पुनर्मुद्रित हुई। नीचे दिए सूत्र इसी प्रकाशन से लिए गए हैं।
सामुदायिक स्वास्थ्य एक प्रक्रिया है, जो लोगों को सामूहिक रूप से अपने स्वास्थ्य का उत्तरदायित्व निभाने और स्वास्थ्य को अपने अधिकार के रूप में मांगने में सक्षम बनाती है।
सामुदायिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण का अर्थ है व्यक्ति, परिवार और समुदाय की स्वास्थ्य पर स्वायत्तता बढ़ाना; तथा उन संगठनों, साधनों, अवसरों, ज्ञान और सहायक संरचनाओं पर भी स्वायत्तता बढ़ाना जो स्वास्थ्य को संभव बनाते हैं।
सामुदायिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण में शामिल है:
सामुदायिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण मूलतः एक लोकतांत्रिक, विकेंद्रित, सहभागी, जन-निर्माण और जन-सशक्तिकरण की गतिविधि है। यह मानता है कि यह मूल्य-व्यवस्था समुदाय और स्वास्थ्य-कार्रवाई आरंभकर्ताओं के बीच, तथा आरंभकर्ता टीम के भीतर भी व्याप्त होनी चाहिए। इसलिए स्वास्थ्य-कार्रवाई टीमों के लिए जरूरी है कि अपने आपसी संबंधों में अधिक लोकतांत्रिक, गैर-पदानुक्रमिक, सहभागी, टीम-निर्माण और टीम-सशक्तिकरण की संस्कृति विकसित करें।
सामुदायिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण मानता है कि वर्तमान असमान और स्तरीकृत सामाजिक व्यवस्था में वास्तविक अर्थ में कोई ‘समुदाय’ नहीं है। अतः सामुदायिक स्वास्थ्य कार्रवाई का अर्थ उन बड़े वर्गों का बढ़ता संगठन, जुड़ाव और भागीदारी होगा जो आज निर्णय में पर्याप्त हिस्सा नहीं लेते—गरीब, वंचित, हाशिए पर खड़े लोग। ऐसे प्रयास यथास्थिति की शक्तियों और वर्तमान स्थिति से अधिक लाभ लेने वालों के विरोध का सामना करेंगे। यह दृष्टिकोण हितों के टकराव और सामाजिक तनावों को पहचानेगा, पर समुदाय-सशक्तिकरण के प्रति प्रतिबद्ध होने के कारण स्वास्थ्य से आगे जाने वाले संघर्षों का भी समर्थन करेगा।
बहुसंख्यक गरीब और वंचित स्वयं भी ‘एक समुदाय’ नहीं हैं, भले गरीबी और सामाजिक स्थिति उन्हें जोड़ती हो; क्योंकि उन्होंने समाज को बांटने वाले सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक भेदों को आत्मसात कर लिया है। इसलिए प्रक्रिया के स्तर पर समुदाय की भावना अपनाना तथा समूह गतिशीलता और आपसी संबंध सुधारना किसी भी सामुदायिक कार्रवाई से पहले आता है। अपने सभी कार्यक्रमों के जरिए समुदाय-निर्माण की प्रक्रिया को बढ़ावा दिया जाएगा।
आज की अति-चिकित्सकीकृत स्वास्थ्य व्यवस्था की विशेषताएं हैं:
सामुदायिक स्वास्थ्य कार्रवाई के आरंभकर्ता अक्सर इन्हीं चिकित्सा वातावरणों से आते हैं, पर वे स्वयं को इस व्यवस्था का मात्र विस्तार नहीं मानते। वे इन मुद्दों का लगातार सामना करते हैं और ऐसी नई दृष्टि, कौशल और दृष्टिकोण विकसित करते हैं जो जन- और समुदाय-केंद्रित हों तथा चिकित्सा, पेशेवर कौशल और तकनीक को उनके सही, सीमित स्थान पर रखें।
सामुदायिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण कार्रवाई को समुदाय से बाहर और ऊपर की ओर विकसित करता है, और स्वास्थ्य सेवाओं की मौजूदा अधिरचना के घटकों का सामना करता है—प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, औषधालय, अस्पताल, शिक्षण व शोध संस्थान; चिकित्सा, नर्सिंग, पैरामेडिकल और जन स्वास्थ्य टीमें तथा प्रशिक्षण केंद्र; सरकारी या स्वैच्छिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और संस्थाएं। यह अधिरचना को इस ओर मोड़ता है कि वह:
सामुदायिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण कोई विशेषज्ञता, नई पेशेवर विधा, नया ‘तकनीकी समाधान’ या कार्रवाई का नया पैकेज मात्र नहीं है। यह मुख्यतः स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवा की नई दृष्टि है, मन की नई मनोवृत्ति, स्वास्थ्य कार्रवाई में नया मूल्य-अभिमुखीकरण, और समाज की नई कल्पना से जुड़ा भविष्य का नया परिप्रेक्ष्य। इसलिए इसे मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्थाओं, संस्थानों, शोध, प्रशिक्षण, पेशेवर नैतिकता और स्वास्थ्य नियोजन में व्याप्त होना चाहिए।
सामुदायिक स्वास्थ्य कार्रवाई वैकल्पिक सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक व्यवस्था बनाने के प्रयासों से गहराई से जुड़ी है, जिसमें सभी लोगों के लिए स्वास्थ्य वास्तविकता बन सके। इसलिए कार्रवाई के घटक साधन हैं, साध्य नहीं। समुदाय स्तर की अंतःक्रियाओं के अनुसार उन्हें पुनः उन्मुख, पुनः प्राथमिकताबद्ध, बंद या अधिक प्रासंगिक दिशाओं में बदला जा सकता है।
‘सामाजिक टीका’ शब्द स्वास्थ्य संवर्धन और स्वास्थ्य नीति समुदाय द्वारा अपनाने के लिए सुझाया गया है, ताकि जैव-चिकित्सा केंद्रित स्वास्थ्य क्षेत्र स्वास्थ्य के दूरस्थ सामाजिक, आर्थिक निर्धारकों पर कार्रवाई की वैधता को पहचाने। सामाजिक टीके को जन-लामबंदी और पैरवी का साधन माना जाएगा, ताकि उन सामाजिक और आर्थिक संरचनात्मक स्थितियों को बदला जा सके जो लोगों और समुदायों को बीमारी के प्रति असुरक्षित बनाती हैं। स्वास्थ्य और सामाजिक परिवर्तन को प्रभावित करने वाले बड़े सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक कारकों पर नीति और स्वास्थ्य व्यवस्था शोध बढ़ाने की तत्काल जरूरत है। सामाजिक टीकों को बेहतर समझने के लिए और शोध चाहिए—वे सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रियाएं जो विश्व भर में स्वास्थ्य समता सुधार सकती हैं। किसी एक बीमारी के टीके के शोध में लगाए संसाधनों की तुलना में सामाजिक टीके के साक्ष्य और परीक्षण पर निवेश अत्यंत कम रहा है।
इस रूपक को आगे बढ़ाने के लिए दो परिभाषाएं विकसित की गई हैं:
स्रोत: SOCHARA — Social Vaccine (नारायण; Baum, Narayan, Sanders, Patel, Quizhpe, 2009; Thomas, 2006)
‘सामुदायिक भागीदारी’ शब्द 1978 की अल्मा-अता घोषणा में ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ आंदोलन के प्रमुख सिद्धांतों में शामिल किया गया। घोषणा कहती है कि प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को अधिकतम सामुदायिक और व्यक्तिगत आत्मनिर्भरता तथा नियोजन, संगठन, सहयोग और नियंत्रण में भागीदारी की आवश्यकता है और उसे बढ़ावा देना चाहिए; स्थानीय, राष्ट्रीय और अन्य उपलब्ध संसाधनों का पूर्ण उपयोग करना चाहिए; और उपयुक्त शिक्षा के जरिए समुदायों की भागीदारी की क्षमता विकसित करनी चाहिए। वर्षों में विश्व भर में नागरिक समाज और कुछ सरकारों ने प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा में सामुदायिक जुड़ाव के प्रयोग और अध्ययन किए। हाल में यह प्रक्रिया—नियोजन, प्रबंधन, निगरानी और मूल्यांकन सहित सभी स्तरों, प्रक्रियाओं और चरणों पर भागीदारी—कुछ प्राथमिक स्वास्थ्य रणनीतियों और जन स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में औपचारिक रूप ले रही है। भारत के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM, 2005)—विश्व के सबसे बड़े प्राथमिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में से एक—में ‘समुदायीकरण’ शब्द समुदाय-नेतृत्व वाली स्वास्थ्य कार्रवाई को संस्थागत बनाने और पैमाना बढ़ाने के लिए आया। यह नागरिक समाज के दबाव तथा एनजीओ और राज्य स्तरीय प्रयोगों की बड़ी उपलब्धि रही।
अब स्वास्थ्य व्यवस्था शोध को जन स्वास्थ्य व्यवस्था के इस नए तत्व पर केंद्रित करना और समुदाय व स्वास्थ्य व्यवस्था के इस जोड़ पर कार्रवाई शोध/सहभागी शोध को बढ़ावा देना अत्यंत जरूरी है।
2007 से सोचारा की तमिलनाडु CEU टीम ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत तमिलनाडु सरकार के साथ कम्युनिटी एक्शन फॉर हेल्थ (CAH) प्रक्रिया सुगम की (2012 तक)। प्रथम चरण 6 जिलों के 14 ब्लॉकों और 125 पंचायतों में पायलट रहा; दूसरे चरण में उन्हीं ब्लॉकों में पूर्ण क्रियान्वयन हुआ और 446 पंचायतें कवर हुईं।
हाल में Community of Practice on Accountability and Social Action in Health (COPASAH) का वैश्विक नेटवर्क उभरा है, जो भारत, केन्या, जिम्बाब्वे, पेरू, ग्वाटेमाला और अन्य देशों के समुदायीकरण उत्साही, नवप्रवर्तक और शोधकर्ताओं को अनुभव साझा करने तथा सतत सामुदायिक स्वास्थ्य व नीति कार्रवाई बनाने के लिए जोड़ता है। सोचारा तमिलनाडु टीम इस नेटवर्क से सक्रिय रूप से जुड़ी है।
स्रोत: SOCHARA — Communitization (अल्मा-अता 1978; NRHM रूपरेखा 2005–2012)
अल्मा-अता घोषणापत्र (Alma-Ata Declaration) के 'सबके लिए स्वास्थ्य' (Health for All) के लक्ष्य को साकार करने के लिए सोचारा द्वारा अपनाए गए 5 रणनीतिक सहभागिता मार्ग:
दूरदराज के ग्रामीण व जनजातीय समुदायों और जमीनी संस्थाओं के साथ प्रत्यक्ष भागीदारी, स्थानीय स्वास्थ्य मुद्दों पर पहल और सामुदायिक सशक्तिकरण।
सामुदायिक स्वास्थ्य शिक्षण कार्यक्रम (Community Health Learning Programme) के माध्यम से युवा डॉक्टरों, समाजशास्त्रियों और कार्यकर्ताओं में जन-स्वास्थ्य नेतृत्व विकसित करना।
कमरे में बैठकर किए जाने वाले शोध के स्थान पर लोगों के साथ मिलकर स्वास्थ्य विषमताओं और व्यवस्थागत कमियों का प्रामाणिक साक्ष्य एकत्र करना।
राष्ट्रीय व राज्य सरकारों, स्वास्थ्य मंत्रालयों और वैश्विक मंचों (WHO) के साथ निरंतर संवाद कर 'स्वास्थ्य का अधिकार' कानून और जनहितैषी नीतियों की स्थापना।
जन स्वास्थ्य अभियान (JSA) और People's Health Movement (PHM) जैसे आंदोलनों के साथ मिलकर स्वास्थ्य को जन-मुद्दा बनाना।
प्रो. डी. बनर्जी (Prof. D. Banerji) एवं सोचारा द्वारा विकसित बहुआयामी विश्लेषणात्मक ढांचा। यह उपकरण किसी भी स्वास्थ्य समस्या (उदा. कुपोषण, टीबी, मातृ मृत्यु) की जड़ तक पहुंचने के लिए पांच परस्पर जुड़े संदर्भों की पड़ताल करता है:
जातिगत भेदभाव, लैंगिक गैर-बराबरी, महिलाओं की सामाजिक स्थिति, सामाजिक बहिष्कार और पारिवारिक व सामुदायिक संबंध।
गरीबी रेखा, दैनिक मजदूरी, मौसमी पलायन, ऋणग्रस्तता (कर्ज), पोषण पर खर्च करने की क्षमता और इलाज में जेबी खर्च (Out-of-pocket expenses)।
ग्राम पंचायत स्तर पर शक्ति संतुलन, सरकारी बजट में स्वास्थ्य को मिलने वाली प्राथमिकता, नीतियां, नागरिक अधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही।
खान-पान की पारंपरिक मान्यताएं, प्रसव व बीमारी से जुड़े स्थानीय विश्वास, वर्जनाएं, देसी जड़ी-बूटी ज्ञान और रीति-रिवाज।
सुरक्षित पेयजल स्रोत, जंगल व वनोपज, मौसमी चक्र, कीटनाशकों का प्रयोग, जलवायु परिवर्तन, आवास की स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और हिंदी राज्यों के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, अध्येताओं और ग्राम समितियों के लिए उपयोगी पुस्तिकाएं, पोस्टर, आईईसी सामग्री और शोध रिपोर्ट्स।
दूरदराज के क्षेत्रों में इंटरनेट कम होने पर भी सुनने योग्य आईवीआर कहानियां, रेडियो पॉडकास्ट और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए सचित्र प्रशिक्षण वीडियो।
स्वास्थ्य चर्चा, आशा दीदी की डायरी और लोकगीत
लघु व्याख्या, एमयूएसी फीता व मरीज अधिकार
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य समानता और सामुदायिक सशक्तीकरण के लिए समर्पित साथियों के प्रोफाइल और मैदानी अनुभव।
स्वास्थ्य कोई किताबों की बात नहीं, गांव की चौपाल पर रहने वाले लोगों के दैनिक जीवन, अधिकारों और संघर्षों की सजीव गवाही है।
स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, अध्येताओं और युवाओं के लिए अपने स्मार्टफोन से वीडियो, ऑडियो रिकॉर्डिंग, पोस्टर डिज़ाइन और नैतिक सहमति से दस्तावेज़ीकरण के आसान सबक।
भारत में जन स्वास्थ्य, स्वास्थ्य अधिकार और तर्कसंगत दवाओं के क्षेत्र में सक्रिय अग्रणी संगठनों की डायरेक्टरी।
राज्यस्तरीय जन सुनवाई, ऑनलाइन क्षमतावर्धन वेबिनार और अध्येता संगम में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।
अध्येताओं, डॉक्टरों और शोधकर्ताओं द्वारा हिंदी में लिखे गए विचारोत्तेजक आलेख और अनुभव।
यदि आप आशा कार्यकर्ता, अध्येता, डॉक्टर, शोधार्थी या नागरिक हैं, तो अपने मैदानी अनुभव, पोस्टर, ऑडियो वार्ता या स्वास्थ्य रिपोर्ट मंच पर भेजें।
भाषा गरिमापूर्ण, संवेदनशील और आम बोलचाल की हिंदी होनी चाहिए। जहां स्थानीय शब्दों (निमाड़ी, भीली, गोंडी) का प्रयोग हो, वहां उनका अर्थ अवश्य स्पष्ट करें।
किसी भी व्यक्ति की पहचान, फोटो अथवा ऑडियो साक्षात्कार लेने से पहले उनका यह जानना अनिवार्य है कि यह सामग्री जन-जागरूकता हेतु प्रकाशित की जाएगी।
चिकित्सीय व स्वास्थ्य सलाह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित (ICMR, WHO मानकों के अनुसार) होनी चाहिए। भ्रामक या अवैज्ञानिक दावों को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
सामग्री में जाति, धर्म, लिंग अथवा समुदाय के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। वंचित समुदायों की आवाज को प्राथमिकता दी जाती है।